मेरा अक्स मुझ से मेरी पहचान कराये,
मुझ में ये है, इस में मैं हूँ,
फिर भी ये क्यूँ अनजान रिश्ते बनवाये,
मेरा अक्स मुझ से मेरी पहचान कराये...
इक अनजानी-सी परछाई से ये जुड्वाता है,
इसमें फिर भी मेरा ही सब नज़र आता है,
दूर जाना चाहूँ तो अपने पास ले आये,
मेरा अक्स मुझ से मेरी पहचान कराये...
कहीं मैं छोटा, तो कहीं मैं बड़ा,
कहीं मैं मन ही मन खुद से लड़ा,
इन सब भावों को ये शून्य बनाये,
मेरा अक्स मुझ से मेरी पहचान कराये...
सुख आये तो सब गले लगायें,
दुःख आये तो पास भी ना आयें,
हर क्षण ये ही मेरा साथ निभाये,
मेरा अक्स मुझ से मेरी पहचान कराये...
मैं कौन हूँ, क्या हूँ, नहीं जानता,
दिल दिमाग की और दिमाग दिल की नहीं मानता,
आत्म-मंथन के द्वंद्व से ये मुक्ति दिलाये,
मेरा अक्स मुझ से मेरी पहचान कराये...
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