Saturday, 14 November 2015

गुस्ताखी

एक हसीं गुस्ताखी हो गई जो तुमसे प्यार कर बैठा,
गुनाह तो तब हुआ जब इकरार कर बैठा,
रंज है तो इतना कि सज़ा-ए-मौत दी होती,
नज़र-बंद करके यूं जीना ना मुहाल किया होता,
ना तुम्हे कोई मलाल रहता

और ना इस ना-चीज़ का नामोनिशां रहता ||

Friday, 13 November 2015

दीदार

अजीब संयोग है ना, जिन्हे ये शक्ल देखना भी ग़वारा ना था,
आज अंतिम दर्शन की कतार में सबसे आगे खड़े हैं,
अगर पता होता कि इस मौके पे उनका दीदार नसीब होगा,
तो कमबख्त साँसों को उनके इंतज़ार में ना रोका होता ||